रविवार, 24 जनवरी 2010

विदाई

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सोमवार, 11 जनवरी 2010

सर्दी की छुट्टी !

आख़िरकार दिल्ली में बढ़ती ठंड को देखते हुए आठवीं तक के बच्चों को विद्यालय से पूरे हफ़्ते की छुट्टी दे दी गई । लगातार तीन दिनों से शीत-लहर का प्रकोप ज़ारी है, जिससे यह थोड़ी देर से ही सही ,बिलकुल सही कदम है। शीत-लहर की ठिठुरन बड़े-बड़ों को कंपा देती है,तो फिर छोटे बच्चों के लिए यह और कष्ट-दायी होता है, भले ही वे इसकी फ़िक्र न करते हों।
दर-असल ,सरकारी स्कूलों में जो बच्चे पढ़ने आते हैं उनकी पृष्ठ -भूमि ऐसी होती है,जिसमें जीने के ज़्यादा विकल्प नहीं होते। इन बच्चों के घरों में न तो सही छत होती है,न ही खान-पान का उम्दा इंतज़ाम ,तो फिर सर्दियों के लिए क्या विशेष साधन होंगे,यह आसानी से समझा जा सकता है। इससे बहुत ज़्यादा साधन उन्हें स्कूलों में भी नहीं मिल पाते हैं।
बहरहाल , फौरी इंतज़ाम के ज़रिये बच्चों को स्कूलों से छुट्टी देकर सरकार ने ठीक ही किया है!

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

छात्रों में नशाखोरी की बढती प्रवृत्ति !

आज हमारी चिंता का सबसे बड़ा विषय हमारे छात्रों में तेज़ी से बढ़ती नशाखोरी की प्रवृत्ति है।एक शिक्षक,अभिभावक या बतौर नागरिक हम सबकी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि यह और विकराल रूप ले, इसे ख़त्म करने में पहल करनी चाहिए। आज हम किसी भी सरकारी स्कूल के बाहर यह नज़ारा खुले-आम देख सकते हैं कि छठी कक्षा से लेकर बारहवीं तक के आयु वर्ग के बच्चे मजे से,बेखटके सिगरेट के छल्ले उड़ाते दिख जायेंगे। यही काम पब्लिक स्कूलों के बच्चे भी करते हैं ,पर चोरी-छुपकर।
हम यहाँ इस बात पर विचार कर सकते हैं कि ऐसा क्योंकर हो रहा है? इसके लिए हमारी कार्यपालिका यानी सरकार ही मुख्य रूप से दोषी मानी जाएगी। नैतिक शिक्षा का पाठ तो बच्चे कब का भूल चुके हैं क्योंकि उन्हें हमने विरासत में अश्लील टी.वी. सीरियल,लपलपाती महत्वाकांक्षाएं व पश्चिम की भोंड़ी नकल दी है। अभिभावक स्कूलों के भरोसे बैठे हैं तो सरकारी नीति है कि बच्चों को डाट-फटकार न लगाई जाये! यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि बच्चों को किसी प्रकार के शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना की वक़ालत हरगिज़ नहीं कर रहा हूँ,पर अगर माहौल अच्छा होगा तो बच्चे बिगड़ने वाली स्थिति तक पहुंचेंगे ही नहीं। मैंने कई बार कोशिश की कि उन्हें सिगरेट और शराब के दुर्गुण बताये जाएँ पर बच्चे इसे गंभीरता से लेते ही नहीं। कई बार तो शिक्षक को दिखाकर वे ऐसा करने का दुस्साहस करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अध्यापक केवल एक सरकारी मुलाज़िम है और उसके हाथ बँधे हुए हैं. इसमें भी मैं उनका दोष रत्ती-भर भी नहीं मानता क्योंकि वे एक ऐसे मकड़जाल में फंसे हैं जिसके लिए सीधे-सीधे कोई जिम्मेदार नहीं है। सरकार है कि नियम तो बनाती है पर उनका पालन होना सुनिश्चित नहीं करती। यदि सर्वे किया जाये तो कई स्कूलों के आस-पास सिगरेट और शराब की दुकानें मिल जाएँगी ।
अभिभावक भी आज अध्यापकों को वह सम्मान नहीं देते जिससे उनके बच्चों के सामने उनकी गरिमा बरकरार रहे,फिर कैसे वे बच्चे उस 'मास्टर' को अपना शुभ-चिन्तक मानेंगे ? अगर सही मायनों में इस समस्या को देखा जाये तो समाधान निकल सकता है पर इसके लिए समाज,सरकार और संस्थाओं को एक-सुर में बोलना और काम करना होगा नहीं तो हमारी आने वाली पीढ़ी शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार होगी और हम सब इसके ज़िम्मेदार !

बात अपनों से !

हम २१ वीं सदी में लगातार अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं,पर हमारे नैतिक और शैक्षिक मूल्य निरन्तर पतन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आज समाज में कई कुरीतियों ने जन्म ले लिया है,जिसमें एक प्रमुख रूप से यह है कि हम अपना भौतिक विकास किसी भी कीमत पर करना चाहते हैं। शिक्षा के मंदिर भी इससे अछूते नहीं रहे! न वे गुरू रहे ना ही वे शिष्य। ऐसे अध्यापक थोड़ी संख्या में ही हैं जो अपने काम से न्याय नहीं कर पा रहे पर बदनाम पूरा कुनबा हो गया है। इसका फौरी नुकसान ये हुआ है कि अधिकतर बच्चे बिगड़ रहे हैं और गुरुओं के लिए उनमें मन में सम्मान कम हुआ है। बहुत सारे अन्य कारण हैं जिन्होंने वर्तमान शिक्षा -व्यवस्था को चौपट कर दिया है। समाज ,सरकार और शिक्षकों का मिलकर यह दायित्व है कि शिक्षा -व्यवस्था के गिरते स्तर को रोकें!